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बच्चों में परेशानी भरे बचपन का कारण ‘इरिटेबल बाउल सिंड्रोम’

by Mahima

इरिटेबल बॉउल सिंड्रोम एक आम बीमारी है जो की बड़ी आंत (कोलन) को प्रभावित करता है। इस सिंड्रोम की वजह से पेट में ऐंठन, दर्द,सूजन, गैस, दस्त और कब्ज जैसी  समस्या हो जाती है। यह एक क्रोनिक अवस्था है जो की अगर एक बार हो गयी तो लम्बे समय तक रह सकती है लेकिन यह जीवन भर रहने वाली बीमारी नहीं है और यह दूसरे कोलन कंडीशन्स जैसे यूलिक्रेटिव कोलिट्स अल्सरेटिव कोलाइटिस, क्रोहन डिजीज या कोलन कैंसर जैसी बीमारियों में नहीं बदलता है ।

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आईबीएस से पीड़ित अक्सर अपना काम और स्कूल miss करता है और साथ में ही वह डेली लाइफ की कार्यशैली में भी भाग लेने में सुस्त महसूस करता है। तनाव इस बीमारी को और भी बड़ा देता है अतः इस बीमारी में तनाव से बचना चाहिए। कुछ लोगो में इस बीमारी की बजह से  यूरिनरी सिम्पटम्स या सेक्सुअल प्रोब्लेम्स भी हो सकती है। इर्रिटेबल बोवेल सिंड्रोम, के लक्षण अलग-अलग लोगो में अलग-अलग होते हैं। आम तौर पर इस बिमारी के कारण, मानसिक, पाचन क्रिया से सम्बंधित, आहार तनाव और अवसाद होते है।

IBS किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन  अधिकतर यह किशोर अवस्था में होता है यह  पुरुषो की तुलना में महिलालो में अधिक होता है। इरिटेबल बॉउल सिंड्रोम की वजह तनाव भरा  बचपन हो सकता है। यह सिंड्रोम पाए जाने वाले लोगों में आंत और दिमाग के बीच में संबंध देखा गया है। रिसर्च से यह बात सामने आयी है कि मस्तिष्क  से पैदा हुए संकेतों से आंत में रहने वाले जीवाणुओं पर असर होता  है और आंत में पाए जाने वाले रसायन मानव दिमाग की संरचना को आकार दे सकते हैं।

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न्यूजवीक के लॉस एंजिल्स-कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के ईमरान मेयर के अनुसार “आंत में पाए जाने वाले जीवाणुओं के संकेत संवेदी प्रणाली विकसित करने के तरीके को आकार देते हैं।” मेयर ने पाया, “गर्भावस्था  में ही इससे जुड़े कई  प्रभाव आरम्भ हो जाते हैं और लगभक तीन सालों तक चलते हैं। यह आंत माइक्रोबॉयोम-ब्रेन एक्सिस की प्रोग्रामिंग है।” शुरुआती जीवन की परेशानी दिमाग के संरचनात्मक और क्रियात्मक बदलावों से जुड़ी होती है और पेट के सूक्ष्मजीवों में भी बदलाव का कारण बन  जाती है।

इर्रिटेबल बोवेल सिंड्रोम की समस्या कुछ खाद पदार्थो के सेवन, तनाव, हार्मोन्स में बदलाव और स्टेरॉयड तथा एंटीबायोटिक्स के प्रयोग से अधिक बढ़ जाती है। इस बिमारी से पीड़ित के आँतों की बनावट में कोई समस्या नही होती लेकिन आँतों की बनावट में  फर्क न होने पर भी रोगी  को पेट में दर्द, कब्ज और  दस्त जैसी परेशानी होती हैं और रोगी इसे नजर अंदाज भी नहीं कर पाता।

इस बीमारी की जाँच के लिए डॉक्टर मल और रक्त की जाँच करते हैं। इन्हीं जांचों के आधार पर डॉक्टर इस बीमारी की पुष्टि और इलाज कर पाते है। इस बीमारी में यह भी देखा गया है की रोगी की आंत और इसके जीवाणुओं को संकेत मस्तिष्क से मिलने लगते है, ऐसे में बचपन की परेशानियों के कारण  आंत के जीवाणुओं में जीवन भर के लिए बदलाव हो जाते है । वैज्ञानिको के अनुसार आंत के इन जीवाणुओं में परिवर्तन दिमाग के संवेदी भागों में भी भर सकते हैं, जिससे आंत के उभारों की संवेदनाओं पर असर पड़ता है।

रिपोर्ट: डॉ. हिमानी

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